Elementor #6

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खाना खाने पर उत्तराखंड में दलित की हत्या की गई

कुर्सी में बैठकर खाना खाने पर उत्तराखंड में दलित की हत्या की गई। कुछ उदाहरण नीचे दे रहा हूँ देखिए पहाड़ों में कब कब जाति के नाम पर खुद को सभ्य और सवर्ण समझने वालों ने आतंक फैलाया है। 4 जनवरी 1969 को टिहरी गढ़वाल के कोटि ग्राम में श्री मोहन शिल्पकार की बारात बहु लेकर वापस लौट रही थी। बहु पालकी में बैठी थी यह खबर गांव के सवर्णों को लग गई इतने में सैकड़ों सवर्ण एकत्रित हो गए और बारात पर पत्थर, ढेले, लाठी, डंडों आदि से हमला करके सबको लहू लुहान कर दिया। बहु की पिटाई होती उससे पहले बैठक बिठाई गई प्रत्येक शिल्पकार पर उस जमाने मे ढाई ढाई सौ रुपये जुर्माना लगाकर बारात को आगे बढ़ने दिया। यह खबर 5-11-1969 के स्वतन्त्र भारत लखनऊ से प्रकाशित भी हुई थी। 1980 के मई में अल्मोड़ा जिले के तहसील रानीखेत थाना झिमार के बिरल गावं से एक हरिजन (तत्कालिक संज्ञा) की बारात चली। दूल्हा पालकी पर था और बारात पिपना गावं जानी थी। रस्ते में कफलता गावं के किनारे में एक मंदिर पड़ता है वहां उच्च जाति की बारातें उतरकर अंदर जाती थी और मंदिर में शीश झुककर आगे बढ़ते थे जबकि छोटी जाती के लोग मंदिर के अंदर नहीं जा सकते हैं इसलिए वो बाहर से ही शीश झुकाकर फिर आगे बढ़ते लेकिन उस हरिजन दूल्हे ने बारात रोकने और शीश झुकाने के बजाय आगे बढ़ गया। क्योंकि उसका मत था कि जब अंदर नहीं जाने देते हैं तो शीश झुकाकर क्या करना। इस बात पर स्वर्ण समाज नाराज हो गया उन्हें मन्दिर जाने से भी परेशानी है और मन्दिर का बहिष्कार करने से भी परेशानी है। बारात आगे बढ़ी तो बहुत से सवर्ण औरते भी व्यंग्य करती रही। कुछ आगे चलकर एक ठाकुर खेमानन्द (भूतपूर्व सैनिक ) बारात के आगे आकर खड़ा हो गया और कहने लगा बारात के दूल्हे को पालकी पर चढ़कर आगे नहीं जाने देंगे। उसके साथ सभी सवर्ण लोग खड़े हो गए लेकिन हरिजन भी अपनी जिद पर अड़ गए और उनसे दो दो हाथ करने को तैयार थे अंजाम ये हुआ कि उनका केवल खेमानन्द फौजी मारा गया जबकि बरातियों के 15 लोग मौत के घाट उतार दिए गए। कुछ घायल हुए तो कुछ भागने में कामयाब हुए। वैसे ही 2016 में बागेश्वर के कांडा तहसील के करड़ीया गांव में 35 साल का सोहन लाल चक्की में गेहूं पिसाने गया था वहां प्राइमरी विद्यालय का अध्यापक ललित कर्नाटक पहले से ही मौजूद था और चक्की में आता देख उसे जाति सूचक शब्द कहते हुए चक्की को अपवित्र कहने की बात की। जिसका विरोध सोहन लाल ने किया। ललित को इस बात पर गुस्सा आ गया कि उसने चक्की छू ली और ऊपर से मेरे द्वारा जाति सूचक शब्द कहने पर मुझसे जबान लड़ा रहा है। उसने पास पड़ा दरांत उठाया और सोहन लाल की गर्दन में मार दिया जिससे उसकी गर्दन शरीर पर अलग लटक गई और वहीं दम तोड़ दिया। अब यह टिहरी गढ़वाल के मसूरी-कैम्पटी थाना अंतर्गत बराड़ गांव की घटना जहां जिंतेंद्र खाना खाने और कुर्सी पर बैठने की वजह से एक व्यक्ति को 10-11 जातिवादी आतंकवादियों ने मौत घाट उतार दिया है। यह केवल चंद उदहारण दे रहा हूँ वैसी घटनाएं हमारे देश मे रोज घटती है जो केवल जातिवाद की वजह ही होती है। घोड़ी चढ़ना, बारात निकालना, पानी पीना, खाना खाना आदि के नाम पर हत्या करना यह विश्व गुरुओं के देश में आम बात है। जौनसार, हिमाचल , गढ़वाल आदि पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी मन्दिर के नाम पर गृह युद्ध के हालात बन सकते हैं यदि कोई आवाज उठा दे तो। कई गांव आज भी ऐसे हैं जहां शादी, बारात, सामूहिक पानी, आंगन, बाध यंत्र आदि पर भेदभाव और वर्गीकरण है।